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Dashnam Goswami||Gosai History||दशनाम गोस्वामियों के ऋषि गोत्र

Dashnam Goswami||Gosai History||दशनाम गोस्वामियों के ऋषि गोत्र

A name for the orders of religious mendicants of the Shivaite sect, (the sect which worship Lord Shiv Shankara) from which a caste has now developed Dashnam Goswami are found all over India. The Sanskrit world Go signifies either five senses, a ray of light, or cow. So Goswami means, Master of the five senses (Pnachendriya), a ray of light or master of cow, its significance sometimes varies. Dashnam Goswami can be divided in to Gharbari (who marries) and Sanyasi (who do not marry) In Bengal the heads of Bairagi or Vaishanav monasteries are called Gosain and the priests of the Vishnuite Vallabhachrya sect are known as Gokulastha Gosain. But over most of the India, as in central provinces Gosain appears to be a name applied to member of the Shivate (Shayava panthi) order. Sannyasi means one who abandons the desires of the world and the body. Properly every Brahman should become a Sanyasi in the fourth stage or ashram of his life when after marrying and begetting a son to celebrate his funeral rites in the second stage, he should retire to the forest, become a hermit and conquer all the appetites and passions of the body in the third stage thereafter, when the process of mortification is complete he should beg his bread as a Sanyasi. But now days only those who enter the religions orders now becomes Sanyasis, and the name is therefore confined to them. Dasnami means the ten names, and refers to the ten orders in which the Gosains or Shivaite (the sect which worship Lord Shiv Shankara) anchorites are commonly classified. Sadhu’s generic term for a religions mendicant. The name Gosain is now more commonly applied to the married members of the caste, who pursue ordinary avocations, while the mendicants are known as Sadhu or Sanyasis.Dasnami Sampradaya
One of the major achievements of Acharya Shankaracharya was to organize the Hindu monasticism. He divided the Hindu monks into ten sects called "Dasnami" and organized them under four heads with the Headquarters at Dwaraka in the West, Jagannatha Puri in the East, Rameswaram in the South and Badrikashrama in the North. These became the four sacred "Dhams", "Holy Places" of the Hindus. He also enumerated other details of the order of Hindu monks grouped under these heads for their identity. Although there are today a number of Hindu monastic sects, the most authentic are the ten established by Acharya Shankaracharya.Brahmin Goswami

Brahmin Goswami is a typically a title bestowed on people who choose the path of Sannyasa. The sanyasins or disciples of Adi Shankaracharya are also called "Dash Nam" as the Title Goswami is further divided into ten groups viz. Giri, Puri, Bharti, Ban, Aranya, Sagar, Aashram, Saraswati, Tirth, Yogi and Parwat. These all Dashnam Goswami's are associated with four Math in four corners of India, established by Adi Shankaracharya. Initially all the disciples were Sanyasins who embraced sanyas either after marriage or without getting married. Since, sanyasins are considered as Brahmin therefore during the course of time, those who embraced married life on the order of their guru and their decedents are considered Brahmins with the surname Goswami. Being a Goswami Sanyasin includes a vow of celibacy. Some religious traditions use the title Swami for those who had never married, and Goswami for those who had been married in that life and vow not to marry again. This is also the source of the surname Gosain. Goswami can also refer to an individual from the Brahmin caste of the Hindu religion.Dasanama Sanyasins

Sanaka, Sanandana, Sanat-Kumara and Sanat-Sujata were the four mind-born sons of Lord Brahma. They refused to enter the Pravritti Marga or worldly life and entered the Nivritti Marga or the path of renunciation. The four Kumaras were the pioneers in the path of Sannyasa. Sri Dattatreya also is among the original Sannyasins. The Sannyasins of the present day are all descendants of the four Kumaras, Dattatreya and Sankaracharya.

Sri Sankaracharya, regarded as an Avatara of Lord Siva and the eminent exponent of Kevala Advaita philosophy, established four Maths (monasteries) one at Sringeri, another at Dvaraka, a third at Puri and a fourth at Joshi Math in the Himalayas, on the way to Badrinarayana shrine.

Sri Sankara had four Sannyasin disciples, viz., Suresvara, Padmapada, Hastamalaka and Totaka. Suresvara was in charge of Sringeri Math, Padmapada was in charge of Puri Math, Hastamalaka was in charge of Dvarka Math and Totaka was in charge of Joshi Math.

The Sannyasins of Sringeri Math, the spiritual descendants of Sri Sankara and Suresvacharya, have three names, viz., Sarasvati, Puri and Bharati. The Sannyasins of the Dvaraka Math have two names, viz., Tirtha and Asrama. The Sannyasins of the Puri Math have two names, viz., Vana and Aranya. The Sannyasins of the Joshi Math have three names, viz., Giri, Parvata and Sagara.

The Dasanamis worship Lord Siva or Lord Vishnu, and meditate on Nirguna Brahman. The Dandi Sannyasins, who hold staff in their hands, belong to the order of Sri Sankara. Paramhansa Sannyasins do not hold staff. They freely move about as itinerant monks. Avadhutas are naked Sannyasins. They do not keep any property with them.

The Sannyasins of the Ramakrishna Mission belong to the order of Sri Sankara. They have the name Puri.

Then, there are Akhada Sannyasins, viz., Niranjana Akhada and Jhuni Akhda. They belong to the order of Sri Sankara. They are Dasanamis. They are found in the Uttar Pradesh State only.

Rishikesh and Haridwar are colonies for Sannyasins. Varanasi also is among the chief abodes of Sannyasins.

गोत्र क्या है ? जिस ऋषि के वंश में जो लोग उत्पन्न हुए हैं वही उनका ऋषि गोत्र है , जैसे जमदग्नि, वत्स , शौनक , भरद्वाज , गौतम , मुद्गल, अत्रि , कश्यप , शांडिल्य , वशिष्ठ, पराशर , कौशिक इत्यादि ।
प्रवर क्या है ? जिस ऋषि के गोत्र में श्रेष्ठ ऋषि हुए हैं उनकी श्रृंखला को प्रवर कहते हैं , जैसे जमदग्नि गोत्र का प्रवर है --- भार्गवच्यावनाप्नवानौर्वजामदग्नेति भार्गवौर्वजामदग्न्येति । भरद्वाज गोत्र का प्रवर है -- आंगिरस बार्हस्यपत्य भारद्वाजेति ।

ब्राह्मणों के 52 ऋषि गोत्र हैं । ध्यान रहे कि कुछ ऐसे ऋषि गोत्र हैं जो कि ब्राह्मणों और गोस्वामियों में समान ( Common ) हैं । कुछ गोस्वामियों को अपने ऋषि गोत्रों का ज्ञान नहीं है । वे ब्राह्मणों के गोत्रों को अपना गोत्र बता रहे हैं । ऐसा करना सरासर गलत है । ब्राह्मणों और गोस्वामियों के ऋषि गोत्र अलग - अलग हैं जिनकी जानकारी अनिवार्य है ।

मढ़ी क्या है ? आदि शंकराचार्य ने तो केवल संन्यासियों की दस शाखाओं को संगठित किया था जिनके नाम हैं -- वन , अरण्य , तीर्थ , आश्रम , गिरि, पर्वत , सागर , सरस्वती , भारती और पुरी । लेकिन कालांतर में उन दस शाखाओं में से गिरि , पुरी , वन और भारती ने अपनी उप शाखाएँ स्थापित कर लीं जिन्हें "मढ़ियों" के नाम से जाना जाता है । पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में मढ़ी को "मठिया" बोला जाता है । मढ़ी या मठिया को उप मठ भी कह सकते हैं । आदि शंकराचार्य ने भारत के चार कोनों में चार महामठ स्थापित किये थे -- पूर्व दिशा में पुरी में गोवर्धन महामठ , पश्चिम दिशा में द्वारका महामठ , उत्तर दिशा में ज्योतिर्महामठ , दक्षिण में श्रृंगेरी महामठ । दस शाखाओं को उनसे सम्बद्ध कर दिया था । वन और शाखाओं को गोवर्धन महामठ से , तीर्थ और आश्रम को द्वारका महामठ से , गिरि , पर्वत एवं सागर को ज्योतिर्महामठ से और सरस्वती , भारती एवं पुरी को श्रृंगेरी महामठ से सम्बद्ध किया था । आदि शंकराचार्य परम्परा के संन्यासियों ने कालांतर में अपने मठ या उप मठ स्थापित किये जहाँ पर दीक्षा देकर लोगों को दशनाम गोसाईं / गोस्वामी बनाया जाता था । लोग जिस मठ या उप मठ पर दीक्षित होते थे तो उस मठ या उप मठ का महंत या पीठाधीश उन्हें अपना नाम प्रदान करता था । बस, उसको ही मढ़ी कहते हैं । इस लिहाज से देखें तो मढ़ी एक प्रकार से एक भर्ती दफ्तर ( Recruiting Office ) होता था । मढ़ी को "कुलगोत्र" भी कह सकते हैं । ध्यान रहे कि ऋषि गोत्र और कुलगोत्र में अंतर है । मठ या उप मठ के पीठाधीश को "महंत" कहा जाता है । महंत अपने क्षेत्र का सर्वोच्च धर्माधिकारी माना जाता है । उदाहरण के लिए, मेरी मढ़ी ( कुलगोत्र ) "रामदत्ती" है । इसका मतलब यह हुआ कि मेरा कोई पूर्वज दशनाम संन्यासी रामदत्त के मठ या उप मठ पर दीक्षित हुआ होगा । मेरे खानदान का यही कुलगोत्र ( मढ़ी ) अनंतकाल तक चलता रहेगा । गोस्वामी परम्परा में यह बात सभी को जाननी चाहिए कि ऋषि गोत्र में शादी हो सकती है लेकिन एक कुलगोत्र अर्थात मढ़ी में नहीं । एक मढ़ी के लोग आपस में भाई- भाई या भाई- बहन माने जाते हैं जिनकी आपस में शादी वर्जित है । ऐसी शादी मान्य नहीं है ।

पूरे देश में दशनाम गोस्वामियों की कुल 52 मढ़ियां ( कुलगोत्र ) हैं । अरण्य , तीर्थ , आश्रम , पर्वत , सागर और सरस्वती शाखाओं ने अपनी उप शाखाएं अर्थात मढ़ियां स्थापित नहीं कीं लेकिन गिरि , पुरी , वन और भारती शाखाओं ने अपनी उप शाखाएं अर्थात मढ़ियां स्थापित की थीं जिनकी संख्या 52 है । तिब्बती लामा गुरू की एक मढ़ी है जिसे वेद गिरि ने स्थापित किया था । लामा मढ़ी सहित गिरि शाखा की 28 मढ़ियां हैं । पुरी शाखा की 16 , वन शाखा की 4 और भारती शाखा की 4 मढ़ियां हैं । एक और महत्त्वपूर्ण बात --- शास्त्रों को धारण करके अरण्य , आश्रम , पर्वत , सागर और सरस्वती धार्मिक पीठों अर्थात मठों में बैठकर धर्म के प्रचार - प्रसार में लगे रहे वहीं दूसरी ओर धर्म की रक्षा करने के लिए हाथों में शस्त्र धारण करके और प्राणों को हथेली पर रखकर गिरि, पुरी , वन , भारती उपनामधारक संन्यासी रणमैदान में उतर गए ।
आओ, इन्हीं बातों को दूसरे कोण से देखें जिससे समझने में आसानी हो :---

"तीर्थाश्रम वनारण्य गिरि पर्वत सागरा : ।
सरस्वती भारती च पुरीनामानि वै दश ।।”

तीर्थ :- तीर्थ का ऋषि गोत्र अधिगत ( अविगत ) है और इसकी कोई मढ़ी नहीं है। इसका मुख्यालय गुजरात के द्वारका में स्थित शारदा मठ है ।

आश्रम :- आश्रम का ऋषि गोत्र अधिगत ( अविगत ) है और इसकी कोई मढ़ी नहीं है। इसका मुख्यालय गुजरात के द्वारका में स्थित शारदा मठ है ।

वन :- वन का ऋषि गोत्र कश्यप है और 4 मढ़ियां हैं--1- श्याम सुंदर वन, 2 - गंगा वन ( बलभद्र वन ), 3 - गोपाल वन ( शंखधारी वन ), 4 - भगवंत वन ( रामचंद्र वन ) । इसका मुख्यालय उड़ीसा के पुरी में स्थित गोवर्धन मठ है।

अरण्य :- अरण्य का ऋषि गोत्र कश्यप है और इसकी कोई मढ़ी नहीं है । इसका मुख्यालय उड़ीसा के पुरी में स्थित गोवर्धन मठ है ।

गिरि :- गिरि का ऋषि गोत्र भृगु है । इसका मुख्यालय उत्तराखंड में स्थित ज्योतिर्मठ है । वेदगिरि की लामा मढ़ी को मिलाकर गिरि की 28 मढ़ियां हैं--1- ऋद्धिनाथी, 2- संजानाथी, 3- दुर्गानाथी, 4- ब्रह्मांडनाथी, 5- बैकुंठनाथी, 6- ब्रह्मनाथी, 7- रामदत्ती, 8- श्रृयभृंगनाथी, 9-ज्ञाननाथी, 10- माननाथी ,11- बलभद्रनाथी , 12- अपारनाथी, 13- पाटम्बरनाथी, 14- सागरबोदला , 15- ओंकारी, 16- सिंह श्याम यति, 17-चंदननाथी, 18- नागेंद्रनाथी, 19- सहजनाथी, 20- मोहननाथी,21- बालेंद्रनाथी, 22- रुद्रनाथी, 23- कुमुस्थनाथी, 24- परमानंदी, 25-सागरनाथी, 26- बाघनाथी, 27- रतननाथी, 28- वेदगिरि की लामा मढ़ी।

पर्वत :- पर्वत का ऋषि गोत्र भृगु है और इसकी कोई मढ़ी नहीं है। इसका मुख्यालय उत्तराखंड में स्थित ज्योतिर्मठ है।

सागर:- सागर का ऋषि गोत्र भृगु है और इसकी कोई मढ़ी नहीं है। इसका मुख्यालय उत्तराखंड में स्थित ज्योतिर्मठ है।

सरस्वती :- सरस्वती का ऋषि गोत्र भूर्भुवः है और इसकी कोई मढ़ी नहीं है। इसका मुख्यालय कर्नाटक में स्थित श्रृंगेरी मठ है।

भारती:- भारती का ऋषि गोत्र भूर्भुवः है और इसका मुख्यालय कर्नाटक में स्थित श्रृंगेरी मठ है। इसकी 4 मढ़ियां हैं--1- नृसिंह भारती, 2-मनमुकुंद भारती, 3- विश्वम्भर भारती, 4- मनमहेश भारती ।

पुरी:- पुरी का ऋषि गोत्र भूर्भुवः है और इसका मुख्यालय कर्नाटक में स्थित श्रृंगेरी मठ है। इसकी 16 मढ़ियां हैं--1-केवल पुरी, 2- अचिंत्य पुरी, 3-मथुरा पुरी, 4- माधव पुरी, 5- हृषिकेश पुरी, 6- जगदेव पुरी ,7-रामचंद्र पुरी, 8- व्यंकट पुरी, 9- श्याम सुंदर पुरी ,10-जड़भरत पुरी, 11-गंगा दर्याव पुरी, 12- सिंह दर्याव पुरी,13- भगवान पुरी,14- भगवंत पुरी,15- सहज पुरी, 16-मेघनाथ पुरी ।

विशेष :- कई गोस्वामियों को उपरोक्त सूचियों से आपत्ति हो सकती है कि उनकी मढ़ियों के नाम इन सूचियों में नहीं हैं । क्षेत्रीय उच्चारणों के कारण नामों में अंतर आ गये हैं । मैंने कई बार सुझाव भी दिया है कि ऐसी विसंगतियों को दूर करने के लिए गोस्वामी विद्वानों का एक महासम्मेलन आयोजित होना चाहिए ।

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